भारतीय चिकित्सा -

आज कोई भी मानव ऐसा नहीं है जो कभी अस्वस्थ न हुआ हो और उसने कभी औषधि का सेवन न किया हो । 
यह बात सदैव सही है कि, हम जितना प्रकृति के सानिध्य में रहेंगे उतना ही निरोग रहेंगे । यह भी सत्य है कि कभी - कभी रोग के लिए कारण इतने प्रबल होते है कि मनोव्याधि एवं शारीरिक व्याधि से मानव बच नही सकता और उसे चिकित्सक व औषधियों के शरण में जाना ही पड़ता है । मानव जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं में उपचार तथा चिकित्सा पद्धति का स्थान धीरे - धीरे बढ़ता ही गया ।

Indian medicine


मानव जीवन जितना प्राचीन है उतना ही प्राचीन चिकित्सा शास्त्र का इतिहास भी है । यह भारतीय चिकित्सा प्रणाली लम्बे काल खण्ड तक मानव जीवन को स्वस्थ रखने तथा रोगों के त्रास से मुक्ति प्रदान करने के उद्देश्य को पूरा करती आ रही है।

भारतीय चिकित्सा पद्धति को आयुर्वेद के नाम से जानते हैं, आयुर्वेद समग्र जीवन को सार्थक रूप से जीने का विज्ञान एवं कला है। आयुर्वेद के अनुरूप चिकित्सा का विधान करने के लिए चरक संहिता एवं सुश्रुत संहिता का निर्माण हुआ है।  इन चिकित्साओं में काय चिकित्सा व शल्य चिकित्साओं में पूर्व काल में इतना अनुसंधान हुआ कि जिसे ज्ञात करके यदि आज की चिकित्सा के साथ जोड़ा जाये तो वह बहुत ही हितकर हो सकता है। आयुर्वेद रोग के मूल पर जाता है और वह केवल शामक नहीं है बल्कि शोधक भी है । 

विभिन्न राजनैतिक एवं आर्थिक कारणों से अपने ही देश में इस प्रणाली की उपेक्षा होने लगी तथा आधुनिक एलोपैथिक पद्धति को छोटी से छोटी बीमारियों में भी अपना लिया गया । आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का प्रयत्न नि:संदेह प्रशंसनीय है परन्तु जहाँ एक ओर चिकित्सा विज्ञान की अंग्रेजी पद्धति से व्याधिओं का निवारण शीघ्र होता है वहीं दूसरी ओर उससे विपरीत व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं लेकिन लोग इस पर विचार नहीं करते
। 
इन दुष्प्रभावों को देखते हुए आज पूरा विश्व फिर उसी भारतीय चिकित्सा पद्धति की तरफ उन्मुख हुआ है जिसनें हजारों हजार साल मानव को स्वस्थ एवं रोग मुक्त रखता रहा ।

आधुनिक युग की ही देन है --   अनिद्रा, सिरदर्द, अस्थमा, अवसाद, उच्च रक्तचाप, मोटापा, हृदय रोग, मधुमेह, अर्थराइटिस और जानलेवा एड्स व कैंसर आदि की बढ़ती संख्या । इन सबके लिए तनाव ही उत्तरदायी है । 

सुखी जीवन की पहली सीढ़ी स्वस्थ शरीर है । महर्षि ''सुश्रुत" ने स्वास्थ्य की परिभाषा दी है  जो इस प्रकार है - 
समदोष: समाग्निश्च समधातुमलकिय: ।  प्रसन्नात्मेन्द्रियमना: स्वस्थ इत्यभिधीयते ।।

 वेदों में  चिकित्सा -  

अधिकांश चिकित्सा पद्धतियाँ  रोगोपचार करती है न की रोग का पूर्ण निवारण, किन्तु आयुर्वेद विश्व का एकमात्र ऐसा चिकित्सा शास्त्र है जो औषधि उपचार से भी अधिक महत्व पथ्य, अपथ्य के पालन को देता है क्योंकि रोग कारण को दूर करना चिकित्सा शास्त्र का पहला कदम होता है । जैसे - 

क्रियायोगे निदान  - परिवर्जनम्;  अर्थात रोग को उत्पन्न करने वाले कारण का पहले त्याग करो। 

वेदों में हमारी प्राचीन औषधियों के गुण एवं कर्म वर्णित हैं । इन औषधियों के लाभ तथा शरीर के अंगों पर कार्यों का वर्णन है । 

ऋग्वेद में  चिकित्सा   

1. ऋग्वेद में विष चिकित्सा के लिए खदिर वृक्ष का उल्लेख है। यह ओजवर्धक है। इसको  पैप्लादसंहिता में इसका प्रयोग कुष्ठ विनाश एवं विष विनाश  के लिए प्रयोग हुआ है। 

2. ऋग्वेद में मूंज का भी नाम है जो रक्तस्राव रोकने के लिए प्रयोग में लेने के लिए बताया गया है। मूंज की मेखला रस्सी और आसन आदि बनते थे। इनको बनाने का जो तात्पर्य था वह दस्त , पेचिश , ज्वर, मूत्र रोग , नेत्र रोग, बवासीर , कुष्ठ आदि रोगों को  रोकना था।

3. त्रिफला - यह कफ-पित्त नाशक , दस्तावर और खांसी को नष्ट करता है । नेत्रों के लिए हितकर, बालों को बढ़ाने वाला , स्वरभेद जैसे गलाबैठने को भी ठीक करता है । 

यजुर्वेद में चिकित्सा  


 यजुर्वेद में भी ऐसी विभिन्न औषधियों का उल्लेख हुआ है जो शरीर के विभिन्न अंगों के वैद्यक गुण कर्म चिकित्सा, निरोगता , तेजवर्चसता आदि के बारे में विस्तार से वर्णन करता है। 

1. " माष " शब्द उड़द के लिए आया है जिसका प्रयोग बलप्रद , वीर्य वर्धक, दुग्ध वर्धक , बवासीर, और श्वास रोग को ठीक करने में किया जाता है।

2. बेर  -  यह दस्तावर,  वीर्यवर्धक,और पुष्टिकारक  है।

3.  सिल पर पिसे बेर या गूलर के पत्ते जहरीले कीड़े के काटने में लाभदायक है। इससे उसका विष शान्त हो जाता है । चूर्ण का लेप बना कर कच्चे फोड़े पर लगाने से  वह भी पक जाता है। 


अथर्ववेद में चिकित्सा  


आयुर्वेद की दृष्टि से अथर्ववेद का स्थान महत्वपूर्ण है । अथर्ववेद ही आयुर्वेद चिकित्सा का मूल आधार है। 
1. अपामार्ग  -  इसे अभिचार प्रयोगों का नाशक कहा गया है । भूख अधिक लगना, इन्द्रिय दुर्बलता, बवासीर आदि का  नाशक है, सूखी खांसी में कफ बाहर निकालता है और कुत्ते, सर्प आदि का विष दूर करता है । 

2. अरुन्धती -  यह पलाश आदि से निकलने वाली  लाक्षा (राल, गोंद) है । यह घावों को भरती है, टूटे अगों को जोड़ती है। यह दूध बढ़ाने वाली , विषनाशक , वातनाशक और रसायन है । 

भारत में इसके अतिरिक्त  भी एक और प्रकार की चिकित्सा  अपनायी जा रही है जिसका नाम है भूत विद्या या ग्रह चिकित्सा । इसके सन्दर्भ में सुश्रुत संहितासूत्र -1/7/4 में लिखा गया है - 

भूतविद्यां देवासुरगंधर्वयक्ष: पितृपिशाचनागग्रह मुपसृष्ट चेतां शांति कर्म बलिहरणादिग्रहोपशमनार्थम्। 

अर्थात  भूत-प्रेत, देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष, पितृ, पिशाच, नाग इन सभी के आवेशों से प्रभावित मानव हेतु शांति कर्म एवं ग्रहों के शमन लिए प्रवृत शास्त्र को भूतविद्या कहते हैं । गांव, समाज, शहर या हर जगह के लोग आज अधिकतर इस पीड़ा से दु:खी नजर आते है ।

भारतीय ऋषि मुनियों द्वारा शतायु की परिकल्पना  कपोल कल्पित नहीं वरन् प्रमाणिक आधार पर ही की गयी थी क्योंकि उन्हें  आयुर्वेद का ज्ञान था जो कि विश्व का सबसे प्राचीन चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी शास्त्र है । 
 अथर्ववेद में कहा गया है -  पश्येम शरद: शतम् । जीवेम शरद: शतम्।। 

इस विषय की वर्तमान समय में प्रासंगिकता यह है की इस एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति से होने वाले विपरित  प्रभावों कों कुछ कम किया जा सकेगा । साथ ही आयुर्वेद जैसे विशाल भण्डार कों पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है । जिसे हम इस तीव्र उन्नति वाले युग में विस्मृत करते जा रहें हैं । लोग पुन: प्रकृति की ओर लौट रहें है और ऐसे समय में शायद आयुर्वेद को पुनः नवीन  रुप में प्रतिस्थपित किया जा सके। यही  इसका मूल  उद्देश्य है।